गैरकानूनी जमावड़ा, लोक सेवकों के कर्तव्य में बाधा डालने और शत्रुता को बढ़ावा देने की धाराओं के तहत, उस समय कोटद्वार में तैनात एक पुलिस अधिकारी की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि 26 जनवरी को दीपक कुमार पौड़ी गढ़वाल में अपने दोस्त की दुकान पर थे, जब उन्होंने कुछ लोगों को बगल की दुकान के दुकानदार वकील अहमद को उसकी दुकान के नाम में 'बाबा' शब्द का इस्तेमाल करने पर धमकाते और परेशान करते हुए सुना। जब दीपक कुमार, जो की एक जिम चालक हैं, ने इस मामले के बारे में पूछताछ की, तो उन्हें हस्तक्षेप न करने के लिए कहा गया।
घटना के एक वीडियो में, दीपक कुमार भीड़ का सामना करते हुए पूछते हैं कि दूसरे लोग अपनी दुकानों का नाम बाबा रख सकते हैं, लेकिन अहमद क्यों नहीं? “दुकान 30 साल पुरानी है, क्या आप नाम बदलेंगे?” उन्होंने भीड़ से पूछा। जब उनसे उनका नाम पूछा गया, तो कुमार ने जवाब दिया, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।”
एफआईआर के अनुसार, बजरंग दल के समूह ने पुलिसकर्मियों को धमकाया, पुलिस बैरियर हटा दिया और नारे लगाते हुए कोटद्वार बाजार की ओर भाग गए। एफआईआर में अधिकारी के हवाले से कहा गया है, “बजरंग दल के लोग बाबा ड्रेस की दुकान पर पहुंचे और दुकान के सामने नारे लगाने लगा तथा धार्मिक उन्माद फैलाते हुए अपशब्दों का प्रयोग करने लगे।” रिपोर्ट में कहा गया है कि जब पुलिस ने समूह को इलाके से तितर-बितर किया, तो वे राष्ट्रीय राजमार्ग पर नगर परिषद के सामने मालवीय उद्यान के पास फिर से इकट्ठा हो गए, जहां वे सड़क पर बैठ गए, यातायात अवरुद्ध कर दिया और आक्रामक हो गए।
पुलिस ने इस मामले में तीन अलग-अलग केस दर्ज किए। पहला केस 30–40 अज्ञात प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सार्वजनिक शांति भंग, सरकारी काम में बाधा और पुलिस से धक्का-मुक्की के आरोप में दर्ज किया गया। दूसरा केस स्थानीय निवासी वकील अहमद की शिकायत पर गाली-गलौज और जातिसूचक भाषा के इस्तेमाल को लेकर दर्ज हुआ। तीसरा केस कमल पाल की शिकायत पर दीपक कुमार और उनके साथियों के खिलाफ दर्ज किया गया है।
अब एक सवाल ये भी उठता है कि वीडियो में जैसा कि देखा जा रहा है जिसमें दीपक कुमार कोई निजी तौर पे किसी से बहस नहीं कर रहे, वो नैतिकता के आधार पर एक बुजुर्ग की मदद कर रहे और बजरंग दल के लोग उन पर हमला करते है, धमकाते है मारने की कोशिश करते इसके बावजूद अगर दीपक कुमार पर FIR होती है तो ये काफी गंभीर साबित हो सकता है। ऐसे में क्या कोई व्यक्ति किसी के मामले में फिर हस्तक्षेप करेगा?

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